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सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का दौर

साफ है कि देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अधिक तेज हो गया है। परिणाम है कि अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े दूसरे तमाम मुद्दे चुनावी नतीजे के लिहाज से अप्रासंगिक हो गए हैँ।

पंजाब में सिमरनजीत सिंह मान का लगभग राख से उठ खड़ा होना एक महत्त्वपूर्ण संकेत है। मान ने खालिस्तान के प्रति अपना समर्थन को कभी नहीं छिपाया। इस साल ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर अमृतसर के अकाल तख्त में जब खालिस्तान समर्थक नारे लगाए गए, तब मान वहां मौजूद थे। ये बात ध्यान में रखने की है कि लंबे समय तक मान पंजाब की राजनीति में हाशिये पर रहे। लेकिन अब अचानक उन्होंने दमदार वापसी की है। यह आखिर क्या बताता है? क्या यह पंजाब में सांप्रदायिक आधार पर फिर से हो रहे ध्रुवीकरण का संकेत नहीं है? अब ध्यान उत्तर प्रदेश की तरफ ले जाएं। पंजाब के  संगरूर की तरह वहां रविवार को आजमगढ़ और रामपुर के चुनाव नतीजे आए। इन दोनों सीटों को कभी समाजवादी पार्टी के लिए बिल्कुल सुरक्षित समझा जाता था। वजह इन दोनों जगहों पर मुस्लिम मतदाताओं की बहुतायत है। लेकिन इस बार दोनों सीटें सपा हार गई। सीधा संकेत है कि रामपुर में सपा के मुस्लिम उम्मीदवार के खिलाफ हिंदू मतदाताओं की पूर्ण गोलबंदी हुई। उधर आजमगढ़ में चूंकि बसपा का उम्मीदवार मुस्लिम था, तो मुसलमानों ने उसे अपनी पसंद बनाया। बसपा वहां लगभग दो लाख 70 हजार वोट ले गई।

इन तीनों नतीजों को एक साथ जोड़ कर देखें, तो साफ होता है कि देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अधिक तेज हो गया है। परिणाम है कि अग्निपथ या अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े दूसरे तमाम मुद्दे चुनावी नतीजे के लिहाज से अप्रासंगिक हो गए हैँ। अब इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा, इस बारे में फिलहाल अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। समस्या इसलिए अधिक गंभीर है कि देश में ऐसी कोई राजनीतिक शक्ति नहीं है, जो इस दुश्चक्र से देश को निकालने की इच्छाशक्ति और समझ रखती हो। अधिकांश पार्टियां और संगठन धर्म, जाति, क्षेत्र आदि जैसे पहचान के अलग-अलग मुद्दों पर ध्रुवीकरण में फिलहाल अपना हित देख रहे हैं। इस राजनीति का नुकसान उन समूहों को हुआ है, जो विकास और बेहतरी को अपने एजेंडे पर रखते हैँ। लेकिन असल में यह भारत का नुकसान है। दरअसल, अपने देश ने एक अनिश्चित और अस्थिर भविष्य का रुख कर लिया है।

Aanand Dubey

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